Friday, September 7, 2018

महिलाओं पर आईएस के अत्याचार

इन तंबूओं में अपने तीन बच्चों के साथ रहने वाली बहार दाऊद में कहती हैं, "मैं कभी-कभी 30 बार बेहोश हो जाती थी." यह कहने के थोड़ी देर बाद ही वो ज़मीन पर गिर जाती हैं.
7,000 अन्य यज़ीदी महिलाओं की तरह बहार को आईएस हमलावरों ने ग़ुलाम बना लिया था और उनके साथ बहुत क्रूरता की थी. माना जाता है कि आज भी क़रीब तीन हज़ार महिलाएं आईएस की ग़ुलामी में हैं.
उनके बच्चे उनके पीटे जाने का दाग़ दिखाते हैं.
वो कहती हैं, "ये बच्चे आज भी अपने पिता और भाई के बारे में पूछते रहते हैं." इस दौरान उनकी बेटी रमज़्या अपनी मां को ज़ोर से पकड़ लेती है.
"हमें पिछले दो साल से उनके बारे में कुछ नहीं पता."
इस परंपरागत परिवार में उनकी देखभाल के लिए कोई पुरुष मौजूद नहीं है. 33 वर्षीय मां और उनके बच्चे यहां यज़ीदियों की सहायता में जुटी जर्मन एजेंसी की सहायता से एक स्थानीय यज़ीदी परिवार के अनाथालय में रह रहे हैं.
हज़ारों की संख्या में यज़ीदी अब इराक के उत्तरी कुर्दिस्तान इलाके में फैले विस्थापितों के शिविर में रह रहे हैं.
यज़ीदी कैंपों में आज भी कार्यरत उन कुछ अंतरराष्ट्रीय गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) में से एक ब्रिटिश चैरिटी वार चाइल्ड के क्रिस फ़ेल्प्स कहते हैं, "यज़ीदी मानते हैं कि उनके पड़ोसियों ने उन्हें धोखा दिया और उनकी सरकार ने उन्हें भुला दिया और सहायता का प्रावधान घटता जा रहा है." ग़दाद में केंद्र सरकार और उत्तरी इराक के कुर्द प्रशासन के बीच विवादों ने कुर्द और अरब समेत उन इलाकों में राहत कार्यों और सुरक्षा व्यवस्था को और मुश्किल बना दिया है.
वहीं बच्चों के साथ गेम खेल रहे एक शिक्षक से मैंने पूछा, "आपका क्या सपना है."
उन्होंने बिना रुके कहा, "हम चाहते हैं कि सहायता के लिए यहां और भी एजेंसियां आएं और हमारी मदद करें. अगर वो यहां नहीं आतीं तो दुनिया को हमें यहां से बाहर निकलने में मदद करनी चाहिए."
यज़ीदी धर्म विश्व की सबसे पुरानी धार्मिक परंपराओं में से एक है. पूरी दुनिया में 10 लाख से भी कम यज़ीदी हैं और इनमें से अधिकांश इराक में रहते हैं.
उनके विश्वास, संस्कृति और मान्यताओं को ख़त्म करने के लिए किए गए आईएस के हमलों को संयुक्त राष्ट्र ने नरसंहार की संज्ञा दी है.
आईएस हमलों में बचे यज़ीदियों के सबसे बड़े मंदिरों में से एक के पुजारी शेख इस्माइल बहरी कहते हैं, "दुनिया के सभी देशों को हमारी स्थिति देखनी चाहिए. हमने किसी को नुकसान नहीं पहुंचाया है. हमें सुरक्षा और मदद की ज़रूरत है."
यज़ीदियों की दुर्दशा से पिघले ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और जर्मनी समेत कुछ देशों ने सीमित संख्या में उन्हें अपने यहां शरण देने का मन बनाया है, खास कर उन महिलाओं को जो आईएस की क्रूरता का शिकार हुई हैं.
बीबीसी रेडियो की प्रेज़ेंटर रैचेल ब्लैंड की बुधवार सुबह मौत हो गई. वे पिछले दो साल से ब्रेस्ट कैंसर से पीड़ित थीं.
रैचेल के परिजनों ने उनकी मौत की पुष्टि की है. 40 वर्षीय रैचेल बीबीसी के रेडियो 5 लाइव की जानी-मानी प्रेज़ेंटर थीं.
उन्होंने कैंसर से जुड़ा एक पॉडकास्ट 'यू मी एंड द बिग सी' को होस्ट भी किया था. उनके इस कार्यक्रम को काफ़ी सराहा गया था.
इसके साथ ही रैचेल पिछले दो साल से अपना एक ब्लॉग भी चला रही थीं जिसमें वो कैंसर से ख़ुद की लड़ाई के बारे में लिखा करती थीं. उनके इस ब्लॉग को अवॉर्ड भी मिल चुका है.
रैचेल की मौत का समाचार देते हुए उनके पति स्टीव ने कहा, ''वो एक बेहतरीन और टैलेंटेड ब्रॉडकास्टर थीं. इसके साथ ही वो बहुत प्यार करने वाली बेटी, बहन, आंटी, पत्नी और इन सबसे बढ़कर फ़्रेडी (उनका बेटा) के लिए बेइंतेहा प्यार करने वाली मां थीं.''

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